दिल की अभिव्यक्ति

दिल की अभिव्यक्ति
दिल की अभिव्यक्ति

Saturday, April 18, 2020

धनवंतरि पर थूके अफ़जल
 तुमको समय रहा ललकार
 उठो राम गांडीव संभालो
 तुमको नर्सें रहीं पुकार

 दुश्मन मुंह पर थूक रहा है
 जिह्हा खींच लो तुम इनकी
 ये पौरुष को ललकारें हैं
 नस्ल मिटा दो तुम इनकी

 घर घर से अफ़जल निकले हैं
 मानवता को कुचल रहे
 मौत बांटने निकले हैं ये
 जिंदा अफ़जल मचल रहे

 इन दानव का अंत करो
 तब आग बुझेगी सीने में
 जब तक ये अफ़जल जीवित हैं
 मज़ा नहीं है जीने में

 भारत मां का दूध पुकारे
 अब इनका संहार करो
 लाज रखो भारत माता की
 फिर जाकर विश्राम करो
    ऋषि राज शंकर 'मुफ़लिस'
     प्रातः 7बजे 04/04/2020
शिकस्तों के कब्रिस्तान पर
ताज,उम्मीदों का टूटा पड़ा है
ना‌ जाने कैसा मुश्किल
वक़्त सर पर आ पड़ा है
जिन्हें समझा था अपना
हमनेअपनी ज़िन्दगी में
वो हर शख़्स यूं दामन
छुड़ा के चुप खड़ा है
अंधेरी सी गली में
भागतीअब जिंदगी है,
कि हर इक मोड़ पर मेरा
सा इक साया खड़ा है
तकाज़ा वक्त का है
सब्र करके देखता हूं
ना जाने रास्ता बाक़ी
अभी कितना पड़ा है
'मुफलिसी' हाथ धोकर
इस कद्र पीछे पड़ी है
मैं अपनी ज़िद में हूं
डट कर उसूलों पर अड़ा हूं
  ऋषि राज शंकर 'मुफ़लिस'
     प्रातः 11बजे 27/02/2020
गरज कर सारी रात वो बरस गए मुझ पर
समझ ना पाये हम,अंदाज़ कातिलाना था
सह गए हम भी इल्जा़मात बड़ी ख़ामोशी से
रह गये चुप मगर बहुत कुछ बताना था

हर पल आस का दीप जलाये
मन में इक विश्वास जगाये
मैं तुझे ढूंढता रहता हूं
कुछ बहका बहका रहता हूं
ना जाने ज़िंदगी में कितने इम्तिहान बाक़ी हैं
अभी छूने को कितने आसमान बाक़ी हैं
थक गया हूं मैं इस बेइंताही दौड़ में अब
ना‌ जाने चढ़ने को कितने पायदान बाक़ी हैं
   ऋषि राज शंकर 'मुफ़लिस'
     प्रातः 8बजे 5/12/2019

ऐ खुदा उस मील के पत्थर को दिखा दे
तुझसे हूं कितना दूर जो अब इसका पता दे
मिलने की तलब तुझसे अब बढ़ती ही जा रही
मुझे ख्वाहिशों से दूर कर ,अपनी पनाह दे
परवरदिगार 'मुफलिस' पे रहमत की मेहर कर
इस पार से उस पार कर जीवन संवार दे
     ऋषि राज शंकर 'मुफ़लिस'
     प्रातः 11बजे 5/12/2019
तुमसे दूरी का सोचूं,तो
प्राण उखड़ने लगता है
दिल में पीड़ा का हल्का
सा दर्द उमड़ने लगता है
इक्कीस बरस गुज़ारे तुमने,
आंखों का तारा बनके
शीघ्र घड़ी वो आयेगी जब
जाओगी डोली सजके
सोच सोच कर विदा घड़ी
मन उचटा उचटा लगता है
    दिल में पीड़ा का हल्का....
कभी बेटी बनके लाड़ किया
कभी मां बन डांट लगाई है
हर लम्हा जीवंत जिया
मेरी दुनिया सुखी बनाई है
जब भी तन्हा मैं बैठूं
सब सपना सपना लगता है
    दिल में पीड़ा का हल्का....
ऋषि राज शंकर 'मुफ़लिस'
     सांयः 9बजे 3/12/2019